Friday, 1 March 2013

अनछुआ ख्व़ाब

एक अनदेखा अनछुआ सा ख्वाब है तू
 हर लम्हे में शामिल एक अहसास है तू
तुझे पाने की तमन्ना ऐसी है मुझको \
जैसे तपती ज़मी पर कोई सैलाब है तू

कोशिशें की बहुत निगाहें फेरने की
पर आँखों में सूरत कोई आती नहीं
सोचूं न कैसे बारे में तेरे
हर धड़कन के पहले और बाद है तू

बेरुखी भी अब तेरी लगती है अच्छी
खुश रहे वहां,जहाँ आबाद है तू
तेरी मौजूदगी की अब नहीं चाहत
मेरी यादो के पन्नो में बेहिसाब है तू

इरा टाक (अनछुआ ख्वाब से  )

1 comment:

  1. बेरुखी भी अब तेरी लगती है अच्छी
    खुश रहे वहां,जहाँ आबाद है तू
    तेरी मौजूदगी की अब नहीं चाहत
    मेरी यादो के पन्नो में बेहिसाब है तू

    ....लाज़वाब अहसास...बहुत सुन्दर

    ReplyDelete