Sunday, 23 August 2020

मम्मा की लॉकडाउन डायरी - inforanjan.com पर प्रकाशित

13 मार्च को हम जयपुर से मुंबई पहुंचे थे। उस दिन मेरा जन्मदिन भी था। मेरे बेटे विराज और पति दुष्यंत ने मेरे लिए सरप्राइस प्लान किया था। शाम को हम लोग घूमने भी गए थे, हालांकि हमने मास्क लगाया हुआ था, पर बाकी लोग लापरवाही से ऐसे ही घूम रहे थे। कोरोना से बचाव के लिए जगह-जगह पोस्टर लगे थे लेकिन कोरोना को लेकर कोई सावधान, जागरूक नहीं था। फिर लॉक डाउन हो गया और हम तीनों मुंबई के मढ़ अाईलैंड में अपने घर में कैद हो गए।बेटा विराज मुंबई में अपनी छुट्टियां बिताने के इरादे से आया था, पर यहां वो कैद हो गया था।

काम के सिलसिले में मुझे और मेरे पति को अक्सर ट्रैवल करना पड़ता है तो यह पहला मौका है जब मार्च से हम लगातार साथ हैं। यह बड़ा मुश्किल समय है खासकर बच्चों के लिए क्योंकि वह स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, अपने दोस्तों के साथ नहीं खेल पा रहे हैं और एक आम जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं।
ऐसे में मां होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई। मेरी हर वक्त एक ही कोशिश रहती कि विराज जोकि 12 साल का है किसी भी तरह की बोरियत, तनाव, अवसाद या अकेलेपन का शिकार ना हो। मैंने उसको इस लॉकडाउन में बहुत सारी चीजें पकाना यानी कुकिंग सिखाई। घर के अन्य कामों में भी उसने पूरा सपोर्ट किया। सैनिटाइजेशन की जिम्मेदारी उसके नाजुक कंधों पर ही है। मेरा बेटा शुरू से ही अपनी उम्र से ज्यादा समझदार और संवेदनशील है। उसको डांटने मारने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई क्योंकि वह इशारे से ही बात समझ जाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसके साथ लूडो, ताश, कैरम, चैस, फुटबॉल, बैडमिंटन और ना जाने क्या-क्या खेल खेले। कई बार मैं उसका छोटा भाई "आदी" जोकि एक वर्चुअल भाई है, बन जाती हूं। हम पूरे दिन मजे करते हैं, खूब हंसते हैं।

  हम लोग 3 मई को मुंबई से जयपुर लौट आए। घर पर 14 दिन हमें होम क्वारांटीन किया गया। इस दौरान हमने अपनी वह सारी इच्छाएं पूरी करी जो पिछले कई सालों से वक्त ना मिल पाने के कारण अधूरी पड़ी हुई थी।हमने लॉकडाउन में गार्डनिंग पर फोकस किया और छत पर टैरेस गार्डन बनाया जहां शाम को हम सब मिलकर बैठते हैं - म्यूजिक सुनते हैं, बातें करते हैं। रात में सोने से पहले हम तीनों मिलकर कहानियां बनाते हैं और एक दूसरे को सुनाते हैं।

लॉक डाउन के दौरान मैंने विराज को रोज एक फिल्म देखने की इजाजत दी ताकि वह वर्ल्ड सिनेमा को समझ सके और साथ ही साथ रोज एक किताब का कुछ हिस्सा पढ़ने, हैंड राइटिंग सुधारने और 25 तक के पहाड़े याद करने की आदत डलवाई।
  नई-नई क्रिएटिव चीजें बनाने पर ध्यान दिया। Tribal पेंटिंग की, क्राफ्ट के आइटम बनाए, पुराने सामान से डेकोरेटिव आईटम्स बनाए। मैं विराज के साथ मॉर्निंग वॉक पर भी जाती हूं तब उसे पेड़ पौधे और पक्षियों के बारे में जानकारी देती हूं ताकि उसकी जनरल नॉलेज बढ़े, वो कुदरत से वाक़िफ हो सके। विराज को फोटोग्राफी का शौक है तो मैंने उसे कैमरे की बारीकियां समझाई और दिन में एक से डेढ़ घंटा वह कैमरे की आंख से देखते हुए अच्छे-अच्छे फोटोग्राफ्स खींचता है।

लॉक डाउन में ही उसका जन्मदिन पड़ा, जिसके लिए हमने घर पर केक बनाया और हर मायने में उसके लिए ये दिन ख़ास बनाने की कोशिश की।
इस तरह लॉक डाउन का यह समय हमने पूरी तरह क्रिएटिव एक्टिविटी में बिताया। मैंने इस दौरान अपना लिखना बहुत कम किया क्योंकि मेरा सारा फोकस अपने बच्चों पर है जी हां विराज के अलावा मेरे दो बच्चे और हैं एक मेरे पिताजी जो अब ओल्ड है और डायबिटीज होने के बावजूद उन्हें हर समय मीठा चाहिए, उन से जूझना और मांगें पूरी करना भी बड़ा मुश्किल काम है। दूसरा बच्चा पिकोलो यानी हमारा पालतू डॉग। यह एक Cane Corso है, जो काफ़ी बड़ा और बहुत ही समझदार है। इसके साथ पूरे समय मस्ती करना, खेलना कूदना, बातें करना तो लॉकडाउन में बहुत सारा समय होते हुए भी मैंने अपने काम को समय नहीं दिया और इस समय को अपने बच्चों की देखभाल में लगा दिया।

इस समय हमारे घर पर क्रिसमस ट्री एक बुलबुल के जोड़े ने घोंसला बनाया और तीन अंडे दिए, जिनमें अब बच्चे निकल आए हैं।
इस तरह मेरा परिवार मिलजुल कर सकारात्मक रहते हुए एक अच्छा समय बिता रहा है और ये समय जल्द गुज़र जाएगा ऐसी उम्मीद रखे है।
ये कोरोना काल हम सबकी जिंदगी का एक अजीब और मुश्किल समय है लेकिन मुझे लगता है कि अगर सब मिलकर प्यार से पॉजिटिव रहते हुए इस वक्त का सामना करें तो काफी हद तक तनाव कम होगा और यह वक्त भी बहुत जल्दी गुजर जाएगा।
लॉकडाउन खत्म होने के बाद जब सब कुछ नॉर्मल होगा, विराज स्कूल जाने लगेगा, तब मैं अपने काम पर ज्यादा फोकस कर पाऊंगी और अभी मैं उसके साथ यह कीमती समय इंजॉय कर रही हूं क्योंकि पहले हम कभी इतना वक्त साथ नहीं रहे और शायद सब सामान्य होने पर इतना वक़्त निकाल पाना मुश्किल होगा।
इस वक़्त को मैंने पूरी तरह विराज की मम्मा, दोस्त, टीचर और भाई बन कर जिया है।
- इरा टाक
राइटर, फिल्ममेकर 

Saturday, 27 June 2020

मृत्यु एक नयी यात्रा

मृत्यु एक नयी यात्रा है, मैं मृत्यु की खबर पर शांत हो जाती हूँ पर दुखी नहीं होती. ज़िन्दगी में इतने अंधेरों से गुज़री हूँ कि सुख- दुःख का बोध समाप्त हो गया है. अच्छे से पता है कि हर चीज़ नश्वर है इसलिए किसी का मोह इतना नहीं होता कि उसके छूटने का दुःख हो. संवेदनाएं ज़रूर होती है, कई बार मन आहत भी होता है पर मिथ्या आडम्बर नहीं कर पाती. मन को मुक्त करने का निरंतर अभ्यास करती हूँ.

मेरी माँ अल्जाइमर रोग के चलते साढ़े चार साल बिस्तर पर रहीं, उनकी सेवा करते हुए मैंने मृत्यु को इतने करीब से देखा कि उसका भय ही खत्म हो गया. उनको नहलाना, डाईपर बदलना, उनको कुछ भान नहीं रहा था वो मल को हाथ में ले लेती थीं फिर बिखरे हुए और नाखूनों में भरे मल को साफ़ करना, शरीर पर हो रहे घाव साफ़ करना, पट्टी करना  और उनको खिलाना -पिलाना.
थकान, गुस्सा, वितृष्णा, दया, खीज, अवसाद जैसे कई- कई भाव मुझे घेरे रहते थे. सिर्फ मेरा काम मेरे लिए एक सुकून था, जलते हुए रेगिस्तान में छाया की तरह !
उनको मेरे सिवा कुछ याद नहीं रहा था. मृत्यु से ठीक पहले जब वो मूर्छित थीं तब भी मेरी आवाज़ पर उनके होंठ हिलते थे. फिर उनकी मृत्यु (2015) पर मैं खामोश रही... बिलख कर नहीं रोई. कई महीने बाद मुझे रोना आया. लेकिन मैं हलकी हो गयी थी, वो साढ़े चार साल मेरे जीवन का विकटतम समय था. मैं दो- चार दिन से ज्यादा उनको छोड़ कहीं नहीं जाती थी, मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तोड़ देने वाला वक़्त.
पता नहीं ये सहज है या नहीं पर अब मैं किसी चीज़ से प्रभावित नहीं होती चाहे सुख हो या दुःख. मुझे कोई चिंता नहीं होती , कोई डर नहीं सताता, हमेशा अपनी कमजोरियों पर जीत हासिल करने का प्रयास करते हुए मुझे हमेशा उजाले की उम्मीद रहती है.
     किसी के लिए अगर कोई भाव मरा, तो वो दोबारा जीवित नहीं होता. हर किसी को अपने हिस्से का अँधेरा झेलना है और अपने हिस्से की रोशनी हासिल करनी है. क्या वाकई कोई आपके दुःख में दुखी होता है या आपकी ख़ुशी में सच में खुश होता है?
ये जान पाना मुश्किल है और अगर आप जान जाएँ तो पीड़ा भी होती है.
इसलिए मोह न रखते हुए उम्मीद बने रहना सहज है, सुखद है. जो आया है वो एक आयु लेकर आया है इस सच को स्वीकार कर लेने से दुःख स्वतः ही क्षीण हो जाते हैं.
- इरा टाक 

Sunday, 14 June 2020

दर्द है इतना कि सहा नहीं जाता...

जब दर्द इतना होता है कि सहा नहीं जाता और उसको कह पाने की हिम्मत नहीं होती क्योंकि आप अपना कमज़ोर पक्ष दुनिया को नहीं दिखाना चाहते। जिस चमक की वजह लोग आपसे जुड़ते हैं, उसके कम होने पर उनके मज़ाक उड़ाने का खतरा और वो उपहास न सह पाने की शक्ति।
मेरे जब अवसाद और विकट संघर्ष के दिन थे तब मेरे ख़ुद के रिश्तेदार मेरे फैसलों को कोसने और मेरे सामने या पीछे मेरा उपहास उड़ाने को तत्पर रहते। वो बार बार आपकी कमाई पूछेंगे पर चुपचाप आपके हाथ में पैसे नहीं रखेंगे। वो पैसों से आपकी औकात का अंदाज़ा लगाते हैं पर कभी आपके मन की तकलीफ और संघर्ष नहीं देख पाते।
रिश्तेदारों को छोड़ो मेरे ख़ुद के पिता ने मुझे कभी प्रोत्साहित नहीं किया वो हमेशा हतोत्साहित करने पर लगे रहे। बुरा बोल कर बच्चे कभी आगे नहीं बढ़ते वो दूर होते हैं।

लोग आपको जज करेंगे पर आपके अंधेरे जानने की कोशिश नहीं करेंगे क्योंकि असल संवेदना के बारे में वो जानते ही नहीं। वो सिर्फ असमय मौत पर झूठी संवेदना जताना जानते हैं। सच तो ये है कि ज़्यादातर लोगों को दूसरों की असफलता देख आनंद आता है।
"अरे देखो बहुत उड़ रहा/ रही थी कैसे गिरा मुंह के बल!"
यहां तक कि माता पिता भी अपनी औलादों को उनकी काबिलियत से तोलते हैं वो उनकी असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। वो अपने बच्चों के साथ विश्वास और प्यार का सम्बन्ध कायम नहीं कर पाते कि बच्चे हम तेरे साथ हर पल हैं चाहे जो भी हो हमसे बोल, गले लग, रो ले, तू हमारा फल है हमारी छाया हमेशा तेरी है।
कई बार आपके साथ आपके सिवा कोई नहीं होता एक एक सांस तड़पते हुए डर के साए में लेनी पड़ती है।
नहीं होती हरेक की आदत अपने दुखड़े रोते हुए सहानुभूति जुटाने की, वो ख़ामोशी से संघर्ष करते हैं।
नहीं तमाशा बनाना चाहते अपनी असफलताओं और दुखों का
बात करो, शेयर करो का शोर मचाने वाले खामोशी सुन सकते हैं क्या?
बगैर कुरेदे आर्थिक मदद कर सकते हैं क्या?
तुम ने गलत साथी चुना, तुम्हारे सपने बहुत बड़े हैं, तुम्हारा चरित्र ठीक नहीं, तुम इतने सक्सेसफुल थे अब तुमको कोई काम नहीं मिल रहा, तुम हैंडल नहीं कर पाए सक्सेस को
बगैर ऐसा कोई सवाल पूछे सुन समझ सकते हैं किसी को?
जवाब मंगिए खुद से
खुद को मारना कभी कायराना नहीं होता, बहुत ज़्यादा हिम्मत चाहिए होती है जो जुबां चलाने में नहीं लगती।
और दुनिया के लोगों से घोर मोहभंग !
हम अपने भयावह दुखों और कड़वे सच को कभी नहीं कह पाते क्योंकि शायद ऐसा कोई मिल नहीं पाता जिससे कह सकें।
- इरा टाक
#SushantSinghRajput #CreativeLife #Struggle #Suicide #Depression

Wednesday, 29 April 2020

मन का मालिक


जब मन खाली होता है तो उसमें कुछ न कुछ भरता रहता है, जिसकी दिमाग को भी ख़बर नहीं हो पाती, और जब तक ख़बर होती है देर हो चुकी होती है, क्यों, क्या, कैसे ये सवाल कुलबुलाते हैं! टूटे, बिखरे मन पर काबू कर पाना दिमाग के लिए सबसे मुश्किल काम है। शारीरिक घाव निशान भले ही छोड़ दें पर एक समय बाद पीड़ा नही देते, परन्तु मन के घाव जब भी कुरेदे जाते हैं, तो  "टाइम मशीन" में बैठा उसी पीड़ा की गोद में जा पटकते हैं, फिर हम अतीत की खरोचे वर्तमान में लिए लौटते हैं.
अतीत के पन्ने बार बार पलटने से वर्तमान अधिक मुश्किल हो जाता, इसलिए सारे जवाब, इलाज, मन और दिमाग की मदद से ढूंढने होंगे जो भीतर ही छुपे हैं, और उनका सामना करने की हिम्मत भी हमें खुद ही करनी होगी। ख़ुद को अतीत और भविष्य के फेर से निकाल वर्तमान के एक लम्हे में समेट पाना मुश्किल तो है पर असम्भव नहीं है !
पेंटिंग - इरा टाक 


अभ्यास से सब संभव है. हम अपने विचारों से बनते या बिगड़ते हैं. 24 घंटों में सैकड़ों विचार हमारे दिमाग में आते हैं कुछ चेतन अवस्था में कुछ अवचेतन अवस्था में. पर हमको सही विचार को रोक लेने और गलत विचार को जाने देने की समझ होनी चाहिए. कहते हैं न एक गन्दी मछली सारे तालाब को गन्दा करती है उसकी प्रकार हमारा मन भी एक स्वच्छ तालाब की तरह होता है एक ग़लत विचार, नेगेटिव थॉट हमारे मन की सारी सकारात्मक शक्तियों को खत्म कर सकता है. जैसे हज़ार अच्छाइयों पर सिर्फ एक बुराई होने से पानी फिर जाता है. ये एक चैन रिएक्शन की तरह होता है एक नेगेटिव विचार से नया विचार और उससे दूसरा आप पांच मिनट में ही पांच दस साल पीछे या आगे पहुँच जाते हैं जहाँ थकान के अलावा आप कुछ नही पाते. और कई बार ये सारी  चिंताएं, नकारात्मकता व्यर्थ ही होती. अतीत को आप सुधार नहीं सकते और कई बार भविष्य में वो डर निर्मूल साबित होते हैं. इसलिए विचारों को फ़िल्टर करना सीखना होगा.
एकांत में बैठ कर सोचिये, कॉपी पेन लीजिये एक लिस्ट बना डालिए. किस भय ने आपको जकड़ रखा है, कौन सी बात आपको ताकत देती है और कौन सी कमज़ोर करती है. किसके साथ आपको अच्छा लगता है और किसके साथ आप परेशान रहते हैं, आपके जीवन का क्या उद्देश्य है, क्या आप खुद के प्रति उस उद्देश के प्रति ईमानदार हैं ऐसे ही अनेकों सवाल और शंकाएं जो आपके मन में उठते रहते हैं सब लिख डालिए
बिना biased हुए उनके जवाब ढूंढिए. तब अब पायेंगे कि कितने डर तो व्यर्थ ही थे जिनका अब कोई वजूद ही नहीं फिर भी वो पुराने सामान की तरह सजे बैठे हैं तुरंत उनको निकल फेंकिये जैसे घर में पड़े हुए कबाड़ को समय- समय पर ख़ाली करना ज़रूरी है, ठीक वैसे ही दिमाग की सफाई भी बेहद ज़रूरी है.
इरा टाक 
कितनी ही लोग ऐसे होंगे जो सिर्फ एक दर्द, बोझ की तरह आपकी ज़िन्दगी में शामिल होंगे जिनका काम सिर्फ आपको आहत करने, नीचा दिखाने का ही होगा..निकाल फेंकिये, डिलीट मारिये. अपनी शक्तियों को संचित कर के अपने उद्देश में लगाइए. याद रखिये आप कितने भी अच्छे हो तब भी सबको संतुष्ट नहीं कर सकते इसलिए सबसे पहले आपकी जवाबदेही खुद के प्रति है उसके बाद उन गिने चुने लोगों के प्रति जो वाकई आपके हितैषी हैं. जीवन में बहुत भीड़ मत रखिये क्योंकि जिसके सब मित्र होते हैं असल में उसका कोई मित्र नहीं होता... 

टूटने - बिछड़ने के भय से मुक्त हो
जीवन समझने की कवायद में मुट्ठी खोल देना
जो अपना है वो खिलेगा हथेली पर
वरना लुप्त हो जाएगा ओस की भांति
विरक्त हो जीवन में लिप्त होना
उम्मीदों से भरे हुए , उम्मीद ना करना
एक दिन छूटना है ये संसार भी
अचानक अनजान समय पर
फिर क्यों नहीं तब तक
वर्तमान में मुस्कान लिए
सम्पूर्ण हो खुद के साथ रहते ! 
चुनौतियाँ, अस्वीकृतियाँ हमें कई बार तोड़ कर रख देती हैं पर उनसे जूझ कर आगे निकलना खुद को और तराशना और दुनिया में अपनी जगह बना पाने की जिजीविषा हमें मरने तक जिंदा रखती है. याद रखिये कम्फर्ट जोन से निकले बिना आप कुछ भी खास हासिल नहीं कर सकते. जब तक अपनी लिमिट्स नहीं तोड़ेंगे वही रह जायेंगे जहाँ थे.
तो मन की लगाम अपने हाथों मे कस कर रखिये, अनुशासन ज़रूरी है क्योंकि इसमें आपको वो भी करना होता है, जो करने का अक्सर आपका मन नहीं करता... क्योंकि ये करना आपके लिए बेहद ज़रूरी है.
अपने लक्ष्य को पाने के सपने देखिये, उसकी लिए जुनून से मेहनत कीजिये, मन में आ रहे गलत विचारों को तुरंत रोकना सीखिए और आज इस पल में जीना सीखिए यकीन मानिए आपके पास अपार शक्तियां है बस उनको जागृत करने की ज़रूरत है.
उम्मीद है आप मन पर लगे जाले हटायेंगे हम फिर मिलेंगे लाइफ सूत्र के एक नए एपिसोड के साथ.

- इरा टाक

Saturday, 25 April 2020

ख़ुशी के ख़जाने की चाबी



खुश रहना स्वयं के प्रति पहली जिम्मेदारी है, हम कईयों से बेहतर हालातों में हैं। सेटल तो कभी कुछ नहीं होता, बिना किसी पूर्व चेतावनी के एक पल में सब बदल सकता है !
और हम बांटें रहते खुद को, आधा अतीत में छोड़ आते हैं, चौथाई वर्तमान और चौथाई भविष्य में बिखरे रहते हैं, क्या किसी वक़्त हम एक जगह पूर्ण हो पाते हैं?
ख़ुद को स्वीकार करने का साहस जुटाने के बजाय, अधिकांश समय जो हम नहीं है उसको साबित करने में लगा देते, क्यों सबको जवाब देना ज़रूरी है? यही वक़्त है, व्यर्थ की बातों से पीछा छुड़ा ख़ुद को खाली कर कुछ सार्थक भर पाने का ! क्यों हुआ का जवाब कभी नहीं मिलता इसलिए जहां फंस गये हो वहां से निकलने का मार्ग निकालो !
कई बार दिखावे में इतनी उर्जा नष्ट हो जाती है कि जीवन के असल उद्देश्य के लिए बचती ही नहीं.

Era Tak
दुःख का एक बड़ा कारण ये भी है कि हम अपने जीवन में आये अकृतज्ञ लोगों से दुखी रहते हैं – हमने उसके लिए इतना किया और वो मतलब निकलते ही भूल गया... या वक़्त पड़ने पर हमारे काम नहीं आया जैसे हम उसके बुरे वक़्त में काम आये. हमको for granted लेने लगा.
इसमें गलती हमारी सोच की है कि हम उससे आजीवन स्वामीभक्ति की अपेक्षा करने लगते हैं . अकृतज्ञता दुनिया का जघन्यतम अपराध है फिर भी हमको माफ़ कर के आगे बढ़ना आना चाहिए. हम देने लायक थे तो दे सके, हो सकता है बदले में शायद वो भी हैसियत भर साथ रहा हो. पर उस साथ को हम प्रेम, दोस्ती मान कर भूल कर बैठते हैं. और वर्षों ये दुःख का भाव हमारी आत्मा पर जोंक की तरह चिपके हुए हमारा लहू पीता रहता है. इसलिए मदद करते हुए सिर्फ देने का सुख लेना चाहिए, उसके ग्रेटफुल होने की अपेक्षा किये बगैर. यह याद रखना चाहिए कि kindness कमजोरी नहीं होती यह हमको मानसिक शांति देती है और हमारे मनुष्य होने को सार्थक करती है.
ये कुदरत का नियम है कि जो दिया गया वो वापस ज़रूर मिलता है मगर ज़रूरी नहीं उसी से मिले जिसको दिया गया, किसी और से भी मिल सकता है.
ख़ुद को बड़ा और ख़ास मानना सबसे बड़ी भूल है, सौ की भीड़ में केवल चार लोगों को आपके होने या न होने से फर्क पड़ता है ये सबसे बड़ी सच्चाई है, मिथ्या और यथार्थ के फर्क को समझ कर स्वीकर कर लेना और फिर उस आनंद में मगन रहना... 

पहली जिम्मेदारी

दुनिया नकारेगी कई बार
जैसे कोई वजूद ही नहीं
पीने होगें घूंट
जहर के
बिना कोई प्रतिक्रिया दिए
सब बर्बाद कर
दोबारा
ज़ीरो से शुरू करना होगा
अपनों से आहत होने पर भी
साथ
 चाय पीना ज़रूरी होगा
दर्द को ताकत बनाते- बनाते
जब तुम थकने लगो
और व्यर्थ लगे
खुद का होना
तब भी खुद को प्रेम करना
 तुम्हारी पहली
जिम्मेदारी
होगी.

ज़िन्दगी और मृत्यु का फासला एक क्षण का है, एक क्षण आपके पास सब कुछ और दूसरे ही क्षण शून्य, फिर क्यों सब मुठ्ठी में बांध लेने की कोशिश में हम सारा जीवन छटपटाते हैंजीते जी मुट्ठी खोल देना ही मुक्ति है और खुशी का मार्ग भी.... ज़रूरी नहीं हमेशा जोड़ा ही जाए, जीवन से कई बार बहुत कुछ घटा देना भी रास्ते ज़्यादा सहज और आसान करता है !
तो दोस्तों आपकी खुशियों के ख़जाने की चाबी अपने खुद के पास है, खोजिये और खोलिए ख़जाना.

-
इरा टाक

You can also listen it 
https://anchor.fm/era-tak/episodes/ep-ed7s37


Wednesday, 22 April 2020

ज़िन्दगी धूप है, सूरज से निकलते रहिये


ज़िन्दगी जीने के हज़ारों फलसफे हैं. कितनी भी कोशिश कर लो, ज़िन्दगी एक ढ़र्रे पर नहीं चल पाती, ये गाड़ी कई- कई बार पटरी से उतर जाती है. कितनी भी तैयारी कर लो, ज़िन्दगी नए सवाल के साथ परीक्षा लेती है. हर किसी के लिए एक अलग सिलेबस जो एग्जाम टाइम में ही पता लग पाता है.
जैसे अभी कोरोना का अप्रत्याशित हमला... जिसने देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में कस लिया है. लाखों लोग बीमार हैं, हजारों मर रहे हैं, कितनों के पास पैसे नहीं हैं, रोज़गार नहीं है, भोजन नहीं है. कई के घर वाले दूर हैं... जो साथ हैं उन घरों में शांति नहीं है, घरेलू हिंसा जोर पकड़ रही है. हर किसी का संघर्ष अलग है और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सब कुछ होते हुए भी लॉक डाउन में निराशा से भरे हुए बैठे हैं. कुछ आने वाली आशंकाओं से ग्रसित हैं. हर पहलू में नकारात्मकता ढूंढ रहे हैं. दुखी होना जैसे उनका स्वभाव हो गया है. मुश्किल भी है ऐसे वक़्त में खुद को संतुलित रख पाना, परन्तु संतुलन ही असल परीक्षा तो भीषणतम वक़्त में ही होती है.



 जीवन आशा की डोर थामे रखने का नाम है. हर संभव कोशिश करते हुए खुद को खुश और सकारात्मक बनाये रखना एक कला है जो निरंतर अभ्यास से सीखी जा सकती है.

 अपार संभावनाएं हैं, इस ज़िन्दगी में, हम जितना चाहें हासिल कर सकते हैं. अक्सर लोग अतीत को याद करने में अपना वक़्त बिता देते हैं, कुछ भविष्य के चिंतन में लगे रहते हैं. अतीत की तरफ बार- बार मुड़ कर देखने से या भविष्य की चिंता का बोझ सर पर लादे रहने से रफ़्तार कम हो जाती है. इसलिए वर्तमान में रहना, ज़िन्दगी जीने का सबसे सरल उपाय है. जब अँधेरा गहनतम हो तब निराश होने की बजाय उस वक़्त को याद करें, जब पहले इससे भी गहन अँधेरे से निकल आप रोशनी में आये थे, पैरों में गति आ जायेगी और रोशनी की तरफ फासला कम होता नज़र आएगा.
याद रखिये
" ये भी गुज़र जायेगा ".
कैसा भी वक़्त हो गुज़र जाता है इसलिए सुख में होश न खोना और दुःख में हिम्मत ! जब सब खो जाता है तब भी अगर हिम्मत बची रहे तो वो सब वापस दिलाने की काबिलियत रखती है... ये कोरोना काल का लॉक डाउन, घर में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा एक्टिव रहने, जितना हो सके मदद करने, कम खाने, कम सोचने, कम से कम मोबाइल इस्तेमाल करने का है. ज्यादा वक़्त सोशल मीडिया पर बने रहने से हम अपनी मानसिक शांति भी खो देते हैं. नींद न आना, बैचैनी रहना, दिमाग में हर वक़्त व्यर्थ विचारों का चलते रहना, सिर दर्द, गर्दन और पीठ दर्द जैसी समस्याएँ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मोबाइल, गेजेट्स, इन्टरनेट से जुड़ी हुई हैं.
फोटो : विराज गुरु 

  जीवन में एक लक्ष्य हो, अनुशासन हो और उस लक्ष्य के लिए किसी भी हद तक जाने का जुनून हो. इस वक़्त भी एक टाइम टेबल से चलने की ज़रूरत है, घर में हैं तो क्या? हर चीज़ का एक तय समय होना ज़रूरी है जो आपको बोरियत से बचाएगा और सक्रिय बनाये रखेगा.
खुद को शांत रखने के कई तरीके हैं. अगर आप हमेशा ये जानने में इच्छुक रहेंगे कि दुनिया वाले आपके लिए क्या सोचते हैं, तो यकीन मानिए अपने मन की शांति खो देंगे. काम करने क्षमता कम हो जाएगी, व्यस्त रहिये, मन के मौसम को ‘बसंत मोड’ पर बनाये रखिये.

सुबह नए बहाने
उग आएंगे
जैसे ताज़ी मिट्टी में दबे गेहूं से फूटते हैं
 अंकुर
जैसे सूखे पड़े ठूंठ से फूटती हैं
कोपलें
जैसे बरसात में उग आते हैं
मशरूम
जैसे लिजलिजे प्यूपा से निकलती है
सुन्दर तितली
जैसे सूरज देखते ही गर्व से सर उठाता है
सूरजमुखी.

सांस चलने तक उम्मीद
नहीं बुझनी चाहिए.

वक़्त बीतने के साथ कोई मिट्टी होता है ..कोई सोना बनता है ..कोई बिखरता है, कोई निखरता है. ये सिर्फ आपकी क्षमताओं, जुझारूपन, ज़िद पर निर्भर है. इसलिए मुस्कराइए, कोई साथ दे न दे, आपको खुद के साथ हर पल खड़ा होना है.
जो आप सोचते हैं वो सच भी होगा. इसलिए डरे नहीं, डर कर रोज़ मरें नहीं. यही फलसफा है मेरी ज़िन्दगी का...

“इससे पहले कि मौत हमें पी जाए

चाहिए ज़िन्दगी खुल कर जी जाए.”

तो हिम्मत और धैर्य बनाये रखिये. बच्चों को जीवन जीने के बेसिक स्किल्स सिखाइए. बुजुर्गों के साथ विनम्र रहिये, नयी कोई भाषा सीखिए, फिल्म देखिये, लिखिए- पढ़िए, संगीत सुनिए, संगीत सीखिए, पेंटिंग कीजिये, सिलाई- कढ़ाई कीजिये, नया कुछ पकाइए, मैडिटेशन- एक्सरसाइज कीजिये, डांस कीजिये... जो काम कभी नहीं किया, वह कीजिये, ये समय मुश्किल ज़रूर है पर दोबारा शायद हमारी जिंदगियों में इतना खाली समय न आये. अपने सपनों पर धार लगाइए और हाँ उम्मीद का दिया सुबह होने तक जलाये रखिये... जहाँ एक नया सूरज हमारे इंतज़ार में होगा !

- इरा टाक 



Monday, 30 March 2020

इन लोगों का साहस हमें हिम्मत देता है - इरा टाक



                            जब हम लॉक डाउन की वजह से बंद हैं और अपने खुले, हवादार घरों में बैठे फिटनेस, कुकिंग, फैमिली टाइम की फोटोज, वीडियोस शेयर कर रहे हैं तब हजारों मजदूर खाली पड़े राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैदल ही अपने परिवारों के साथ दो या तीन पोटलियों में अपनी पूरी दुनिया समेटें अपनी ज़मीन की तरफ लौट रहे हैं. हज़ारों किलोमीटर पैदल नाप लेने का साहस, जुनून अदम्य है. ऐसे आपातकाल में जब सब बंद है, तो जाहिर है कि रोज़ कुआँ खोदने वालों के लिए सबसे भारी संकट है. ऐसे में अपनी जड़ों की तरफ लौट जाना उसे लिए जिंदा बचे रहने का एकमात्र उपाय लगता है. जहाँ उसे उम्मीद है कि उसकी धरती माँ उसे जगह देगी, किसी खोली में ठुंसे रहने के लिए उसके पास किराया देने का संकट नहीं होगा जहाँ उसे पेट भर न सही पर रोटी तो मिल ही जाएगी.
      पूरी दुनिया को एक महामारी ने इस तरह हिला दिया है जैसे पहले कभी नहीं हुआ होगा. पर सुविधा ये है कि कम से कम हमारे पास साधन हैं,फ़ोन हैं इंटरनेट हैं जिससे हम दुनिया से अलग- थलग होते हुए भी दुनिया के लगातार संपर्क में हैं.
लगातार लिखने, पढने, गाने सुनने, फ़िल्में देखने के बाद भी मन खाली महसूस करने लगता, मोबाइल पर शेयर हो रहे वीडियोस, सूचनायें थकाने लगती. एक अजीब सी खीज जहन पर तारी होने लगती. फ़ोन, टीवी, इन्टरनेट इतना मसाला भरा पड़ा है कि लोग ऊब सकते हैं, पागल हो सकते है पर बोर तो कतई नहीं हो सकते है. ऐसे में अवसाद में जाने का खतरा बना रहता है, जो अपने परिवारों के साथ हैं वो भी कभी कभी परेशान भी हो रहे, कभी साथ होने का शुक्र भी मना रहे. कहीं घर के काम को लेकर झगड़ों के मीमंस बन रहे हैं, तो कहीं अकेले लोग परिवार के लिए तड़प रहे हैं. हर दिन की अवधि जैसे 24 घंटों से बढ़ कर 42 घंटे हो चुकी है.
फोटो : गूगल 

जब कवि कवितायेँ ,कहानियां भेज कर लोगों के इनबॉक्स भरे दे रहें हैं. लोग quarantine हैश टैग लगा कर सेल्फी पर सेल्फी लगा रहे हैं... ऐसे में सब अचानक  बड़ा अश्लील और क्रूर लगने लगता है. जब दूसरे देश बर्बाद हो रहे हैं हजारों मौतें हो रहीं है तो हम कैसे बेशर्मी से अपने बर्तन धोने या झाड़ू लगाने के वीडियो गर्व से शेयर कर रहे हैं , कैसे सज- धज के तीज त्यौहार मना रहे हैं?

 क्या हमें लगता है हम इस खतरे से अछूते रह जायेंगे. पूरे विश्व की लड़ाई एक ऐसे शत्रु से हैं जो दिखाई भी नहीं देता ऐसे में वो और ताकतवर हो जाता है. उस शत्रु ने पूरी दुनिया रोक दी है शायद दुनिया का कोई भी शहर इतना वीरान और सूनसान पहले न हुआ होगा.
अपनी प्रार्थनाओं में इन सब लोगों को शामिल करने का वक़्त है. अगर हमारे पास बाँट सकने लायक धन और संसाधन हैं तो उनको बांटा जा सकता है. अगर ज़िन्दगी से कोई शिकायत है तो हजारों लोगों की भीड़ को देख कर खुद को समझाया जा सकता है जो खुले आसमान के नीचे बगैर छत के आँखों में सिर्फ अपने गाँव पहुँच जाने का सपना लिए चल रही है.
मैं मुंबई के मढ आइलैंड में अपने परिवार के साथ रहती हूँ और जब से लॉक डाउन हुआ मैं अपने घर जयपुर पिता के पास लौट जाना चाहती हूँ. जब जीवन मरण का प्रश्न घेरने लगा हो तो हमारे नेचुरल इंस्टिंक्ट अपनी जड़ों की तरफ लौट जाने को विवश करने लगती. उस जगह जहाँ की हवा भी हमें जानती है , जहाँ के लोग अजनबी होते हुए भी अपने से लगते हैं, जहाँ की मिट्टी का हम पर कर्ज है. हमेशा सकारात्मक बने रहने के बाद भी कई बार मन व्यथित हो ही जाता है. फिर मढ़ चर्च के बस stop पर एक गरीब महिला को बेंच पर सोते देख, मैं ठहर जाती हूँ, उसको देर तक निहारती हूँ, उसी पल मेरे मन की सारी खिन्नता दूर होने लगती है.
फोटो - इरा टाक 


 हम घरों में भरे पेट बैठे हुए शिकायतों के पुलिंदे लिए हुए हैं और इनके पास ओढने को केवल एक आसमान हैं. गलियों, सडकों में बेरोजगार हुए युवक मोबाइल पर गेम्स खेलने में व्यस्त हैं, बाज़ार में दो हलवाई चोरी छुपे बड़ा पाव बनाने में लगे हैं, सब को रोजगार की फ़िक्र है...कुछ पैसे कमा लेने की चिंता है. चूँकि वेर्सोवा की तरफ से जलमार्ग बंद कर दिया गया है और केवल बस सेवा चालू है, जो मढ़ द्वीप को सड़क मार्ग से जोड़ती हैं. हम पूरी तरह एक टापू पर फंस चुके हैं. बसों में भी अक्सर दो लोग ही नज़र आते हैं - ड्राईवर और कंडक्टर. यहाँ अभी भी मछुआरे मछलियाँ पकड़ और सुखा रहे हैं. यहाँ के समुन्द्र तट पर अभी भी लोग टहल रहें हैं हालांकि अब उनकी संख्या कम हो गयी है. बिल्लियों, कुत्तों और कव्वों की यहाँ भरमार है और आजकल उन्हीं का राज है, इंसान डरा , दुबका बैठा है.
आज सिर्फ धरती के इंसानों को खतरा है वो किसी भी धर्म जात पूछ के शरीर पर हमला नहीं करेगा. मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे आदि सभी धार्मिक स्थल बंद हैं. राशन, दूध. सब्जियां, दवाइयां ज़रूरी हैं. अस्पताल 24 घंटें चालू हैं. शायद अब ये बात सबके दिलो दिमाग में बैठ पाए कि मनुष्य की पहली ज़रूरत अन्न, जल और स्वास्थ्य सेवाएँ हैं. उसका किसी धर्म विशेष का होने से ज्यादा ज़रूरी मनुष्य होना और मनुष्यता को बचा पाना है .
फोटो - विराज डी टाक 
चाल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है, और धरती पर मौजूद प्रजातियाँ भी उसके हिसाब से खुद को ढालती हैं . जो ढाल लेती हैं वो आगे बढती है वो असमर्थ रहती हैं वो विलुप्त हो जाती हैं.
हम सबको इस परिवर्तन में ढ़लने के लिए खुद को तैयार करना होगा. इस जंग को पूरे धैर्य, सकारात्मकता के साथ मनुष्य बने रहते हुए लड़ना है. शायद ये महामारी हम सबको किफ़ायत का सबक सिखा दें. आज समझ में आ गया है कि कम से कम में भी गुज़ारा हो सकता है जीने को बहुत नहीं चाहिए. इस समय में कोरोना ने हमारी सारी ambitions, प्लान्स को धराशाही कर दिया है. अब सबसे पहले जिंदा बचने का प्रश्न है.पता नहीं ये कब तक चलेगा 18 दिन और या कुछ महीने, हम सबको तब तक हिम्मत बनाये रखनी होगी. मजदूरों के अलावा बहुत से कलाकार, फ्रीलान्सर्स भी बेरोजगार हो रहे हैं आज नहीं तो कल उनके सामने जीविका का भारी संकट आने वाला है. पर इस समय मैं यही कहना चाहूंगी -:” आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे”
इस अँधेरे का ढल जाने का इंतज़ार है और उम्मीद है कि हम सब जल्द ही एक नया सवेरा देखेंगे. हो सकता है हम में से कईयों शून्य से शुरू करना पड़े पर हम कर सकते हैं क्योंकि कुदरत ने मनुष्य को ऐसा बनाया है.
फोटो - इरा टाक 


-  -   इरा टाक
लेखक, चित्रकार, मुंबई
30 मार्च 2020