Thursday, 27 March 2014

Photo and Caption by Era tak ~ET~

तू  है साथ तो मुक़म्मल ये जहां 
थोडा सा पानी भी लगता है दरिया 

Wednesday, 26 March 2014

हंसी तो फँसी 
जहाँ स्त्री ने दिखाए दन्त (हॅसना ) वहाँ आदमी लेता उसका अंत
इस तरह की  दकियानूसी कहावतें मैंने बचपन से बहुत सुनी है अपनी माँ से … आप सबने भी  सुनी होंगी … मानो एक स्त्री  का हँसना उसके अंत का कारण हो…पर आज की आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी लड़की /स्त्री  सभी से हँस बात करती है इसका मतलब  ये नहीं  कि वो सामने वाले के जाल में फंस गयी है … अपवाद  सभी जगह होते हैं. कुछ  होती हैं ऐसी  जो  शॉर्टकट चाहती हैं  पर शॉर्टकट जल्दी ही  कट कर  देते हैं.। और मुझे किसी  भी शॉर्टकट की  ज़रूरत नहीं …सफ़ल होने की  ऐसी कोई भूख और जल्दी  नहीं है  
हँस  के बात करना मेरी आदत है  कमज़ोरी नहीं    

Tuesday, 25 March 2014

जो हैं नाराजगियाँ खुद से उन्हें तो निपटा लें
छोड़ फ़िक्र ज़माने की पहले खुद को तो मना लें इरा टाक इरम 

खोज रही है स्त्री खुद को खुद के भीतर

खोज रही है स्त्री खुद को खुद के भीतर 
प्रेम पाने की भाग दौड़ में 
खुश रखने में  दूसरों को 
लादे हुए ज़िम्मेदारियों का बोझ 
कहीं खुद को बहुत पीड़ा 
पहुचती है स्त्री 
जब भी एक पल को अकेली होती है 
मन पूछता है 
उसकी उदासी का कारण 

कारण बहुत हैं …
क्यों एक स्त्री अक्सर भीतर से 
अकेली और डरी  हुई होती है 
सक्षम होते हुए भी 
क्या खुद को वो कभी पूर्ण 
कर पाती है 
सारा आकाश वो एक धरती के टुकड़े को छोड़ देती है
वो टुकड़ा जिस पर उसका प्रिये
एक घर बनाएगा 
पर क्या मिल पाता है उसे वो घर 
एक स्वामिनी की  तरह ?
या वो ख़ुशी जिसके लिए 
उसने अपनी उड़ान छोड़ दी 
 क्या स्त्री खोज पाती है 
खुद को खुद के भीतर …   इरा  टाक 

Friday, 21 March 2014

Sameeksha of Mere Priye !

’एक कविता कहीं
गुम हो गयी!
संभाल न सके तुम मेरे प्रिय!’

के उलाहने से शुरु मेरी तलाश को समर्पित युवा कवयित्री इरा टाक की कृति ’मेरे प्रिय’ की प्रेम कविताएं मैं से तुम तक पहुंचने के लिए प्रेममयी यात्रा पर मन की अतल गहराइयों से निकले ह्रदय की घनीभूत संवेदनाओं से निकली प्रेम की काव्य अनुभूतियां हैं। जब कूंची जब कलम होती है तब जो रंग शब्दों में उभरते हैं, सहज ही उसकी कल्पना की जा सकती है.. ’मेरे प्रिय’ की कविताओं के बिम्ब साकार रूप में पाठकों के मन के कैनवास पर अपना आकार गढने लगते हैं.. छोटे-छोटे बिम्बों की ये काव्यानुभूतियां पाठक-मन को भी प्रेम से ओतप्रोत करता प्रतीत होता है... इन में प्रेम में बहुत गहरे डूबे मन की अपने प्रिय को सम्बोधित आसक्तियों के इंद्रधनुषी रंगों भरी बेचैनियां, उलाहने, रूठना- मनाना और असुरक्षा के भाव....सब कुछ है।
’सच में प्रेम है/ या एक प्रयोग प्रेम को जानने का’ प्रेयसी का प्रेम को जानने- समझने का यह मुहावरा कितना कठोर व मौलिक है और दूसरे ही क्षण अपने कठोर प्रयोग के तराजू की तौलनी से निकल बहुत ही सहज मासूमियत से ’मैं पहाड़ी नदी सी चंचल/ और तुम गहरी झील से शांत’ हो ’जब याद आते हो तुम/ अक्सर खाली कार में/ तुम्हारी सीट पर बैठ जाती हूं’ प्रेमी के आकंठ प्रेम में डूब ’ तुम में जो कमी है/ मैं पूरा करती हूं’ जैसा समर्पण करने में भी संकोच नहीं करती। और जब प्रेमी की उपेक्षा से दो-चार होती है तो वही आकुल- व्याकुल मन ’इससे तो अच्छा तुम मिलते ही नहीं/ कम से कम/ किसी और से तो/ प्रेम कर पाती’ जैसे उलाहनों के बावूजद प्रेम से सराबोर ’बेवजह ही वजह ढूंढती हूं/ तुम से मिलने की’ के भाव में ’एक दुनिया बसा ली है मैंने/और उसे रोज़ सजाती हूं’ में विचरती रहती है।
कुल मिलाकर कहूं तो युवा कवयित्री इरा टाक के पहले संग्रह ’अनछुआ ख्वाब’ की ही भांति बोधि प्रकाशन, जयपुर द्वारा प्रस्तुत यह दूसरा काव्य संग्रह ’मेरे प्रिय’ एक ही शीर्षक सीरीज की ये छोटी- छोटी काव्यानुभूतियां जीवन में गहन प्रेम की परतें खोलता प्रेम का आर्तनादी प्रेम-गान लगता है। ’मेरे प्रिय’ की भूमिका में आलोचक- संपादक प्रभात रंजन भी कहते हैं ’संग्रह कविताओं से गुजरते हुए पहला इंप्रेशन यही उभरता है कि ये कविताएं अलग मिजाज़ की हैं, अलग रंगो- बू की।’ ’इरा टाक की कविताएं जीवन के सबसे निजी, सबसे एकांतिक अनुभवों के आठ की तरह है।’
इरा कहती है,’मेरे लिए रंगों को शब्दों से और शब्दों को रंगो से अलग करना मुश्किल है..ज़िंदगी को अपने तरीके से खूबसूरत बनाने में ये दोनों मेरी मदद करते हैं... कभी सोच कर नहीं लिखा.. जो मन में उतरा... उसे कागज़ पर उतार लिया।’
’मेरे प्रिय’ की कवितांए साक्षी है इस बात की कि जो उनके मन में उतरा उसे उन्होंने कागज़ पर उतार दिया है..
इसकी और गहरे से पड़ताल की है ’मेरे प्रिय’ की भूमिका में हमारे समय के युवा आलोचक- संपादक प्रभात रंजन जी ने

 http://pathhaknama.blogspot.com/2014/03/blog-post.html?spref=fb

Saturday, 8 February 2014

मेरे प्रिय !

अक्सर कहते हो तुम
दुःसाहसी हूँ मैं
दुनिआ की नहीं
सिर्फ अपने दिल की  सुनती हूँ
प्रेम जो अनुशाषित हो तो
प्रेम ही कैसा
मेरे प्रिय  !

Thursday, 6 February 2014

Cover PAge of My Forthcoming Poetry Book

Cover PAge of My Forthcoming Poetry Book

मेरी किताब का मूल्य मात्र 70/- है
इसे VPP से प्राप्त करने के लिए पर अपना पूरा पता 9829018087 sms करें ...या आप इनबॉक्स में msg भी कर सकते हैं ..
mail karen 

eratak13march@gmail.com
sath me Kitaab ka naam likhna na bhoolen .... thanks !

Even A Child Knows -A film by Era Tak