Tuesday, 25 March 2014

खोज रही है स्त्री खुद को खुद के भीतर

खोज रही है स्त्री खुद को खुद के भीतर 
प्रेम पाने की भाग दौड़ में 
खुश रखने में  दूसरों को 
लादे हुए ज़िम्मेदारियों का बोझ 
कहीं खुद को बहुत पीड़ा 
पहुचती है स्त्री 
जब भी एक पल को अकेली होती है 
मन पूछता है 
उसकी उदासी का कारण 

कारण बहुत हैं …
क्यों एक स्त्री अक्सर भीतर से 
अकेली और डरी  हुई होती है 
सक्षम होते हुए भी 
क्या खुद को वो कभी पूर्ण 
कर पाती है 
सारा आकाश वो एक धरती के टुकड़े को छोड़ देती है
वो टुकड़ा जिस पर उसका प्रिये
एक घर बनाएगा 
पर क्या मिल पाता है उसे वो घर 
एक स्वामिनी की  तरह ?
या वो ख़ुशी जिसके लिए 
उसने अपनी उड़ान छोड़ दी 
 क्या स्त्री खोज पाती है 
खुद को खुद के भीतर …   इरा  टाक 

4 comments:

  1. kaha khoz pati hai khud ko khud ke bhitar.....kyonki wo stri hai...dusre jo apne hain,khush karne ke kashamksh me bhul jati hai sankuch....

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  2. nice poetry.
    Women are the real architects of
    society.
    Happy women day.

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  3. गहन भाव से लिखी रचना.

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  4. कृपया मेरे ब्लॉग" शब्दों की मुस्कुराहट " की नवीनतम पोस्ट पर पधारकर अपना स्नेह

    प्रदान करें

    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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