Saturday, 8 February 2014

मेरे प्रिय !

अक्सर कहते हो तुम
दुःसाहसी हूँ मैं
दुनिआ की नहीं
सिर्फ अपने दिल की  सुनती हूँ
प्रेम जो अनुशाषित हो तो
प्रेम ही कैसा
मेरे प्रिय  !

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