Wednesday, 8 January 2014

एक सवाल...



एक सवाल...

बड़ा विचित्र है ये प्रेम
कितना साथ घूमते थे हम
घंटो फ़ोन पर बातें करते थे
ढेरों कीमती तोहफ़े देते थे एक दूसरे को
सैकड़ो तस्वीरें साथ खींची थी
ताकि साथ के हर लम्हे को कैद कर सकें!
कमरे की दीवारों पर, लैपटॉप की स्क्रीन पर
हर तरफ तुम ही तुम नज़र आते थे
मेरी हर खरीददारी तुम्हारे लिए होती थी
नाम भी सिर्फ तुम्हारा ही ,होठो पर रहता था
हर फ़िक्र हर ख़ुशी बांटते थे
उम्र भर के वादे भी किये थे
कितने ही मंदिरों में उम्र भर साथ की दुआएं की थी
जैसे सैकड़ो जोड़े किया करते हैं
फिर क्यों और क्या हुआ
अचानक मेरा प्रेम विलुप्त क्यों हो गया
जबकि मैं सच्ची थी अपनी भावनाओ मे
किसी भी पल मैंने स्वार्थवश प्रेम नहीं किया था
अब यकीन आया कि प्रेम
इनमे से किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं
होता है तो होता है
और नहीं होता तो नहीं होता ...इरा टाक ~ET~

5 comments:

  1. प्रेम में प्रशन, नहीं उम्मीद नहीं , बस बहते रहो ....लम्हे में जीयों खुश रहो :)

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    1. Achha samjha hai Sunita ji aapne prem ko.......yehi prem hai sachha prem jaisa prem hum apne bhagwan se karte hai bina dekhe,bina shikayat kiye...Bas yakeen hai ki wo hai,bas yakeen hai ki humara bura nahi kar sakte,bas yakeen hai ki wo jo karenge achha hi karenge!!!

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  2. Jaha umeed ya sawarth aa gya wahan Prem Nahi rehta......Prem ek pavitra bhaavna hoti hai jo kisi ke liye bhi kabhi bhi humare andar paida ho jaati hai,ek aisi bhaavna jo na rang-roop dekhti hai,na hi umar,na hi jaat-paat!!!

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  3. प्रेम एक सहज,स्वाभाविक श्रोत है,..इसका सोता कब कहाँ से फूट पड़े ये कोई नहीं जानता और न ही कोई ये बता सकता है कि कब ये श्रोत सूख जायेगा ?
    धरती के कुछ सबसे रोचक,रोमांचक रहस्यों में शामिल है 'प्रेम'.

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  4. Meri nazar mein prem ka matlab hai maa ke baad koi dusri khas vajah jiski badolat hum ji rahe hain

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