Sunday, 18 May 2014

बचपन की यादें।अतीत की गलियों से ...Era Tak

याद आती हैं आज.. अतीत की वो गलियां
बेफिक्र था बचपन...तुम्हारी दोस्ती के साये में
आँखों में भर के छलक जाते हैं  कुछ आंसू..
आंसू जिन्हें थाम लेते थे तुम नन्हीं हथेलियों में
जैसे हों वो कोई मोती अनमोल

सर्दी का मौसम..वो कोहरे भरी गलियां
अंगीठी के पास बैठ.. घंटो बतियाते थे हम
सर्दी की कुनकुनी धूप में पतंगें उड़ाते
खाते थे मिल के मूंग के बड़े..तिल के लड्डू

बसंत का मौसम..फूलों से लदा होता था बगीचा
तोड़ लाते थे तुम ढेरों फूल..और मिल के बनाते थे उनसे गहने
पहन के उनको कितना इतराती थी मैं
सब कहते थे मुझे वनदेवी..सुनके शर्माती थी मैं ..

गर्मी का मौसम..बिजली बहुत कम आती थी शहर में
शीशम की छाँव में  बैठ हल करते थे सवाल गणित के
शाम ढले चिमनी की रोशनी में बनाते थे चित्र
गर्मी भी वो सुकून देती थी.. जो अब ए सी में नहीं मिलता

बारिश का गीला मौसम..भीगते थे बरसात में
बनाते थे कश्तियाँ और बुनते थे सपने
आम की डाली पे लटका झूला जहाँ झुलाते थे तुम
बैठ के चबूतरे पर भुट्टे खाते थे हम

वो सारे मौसम जो जिए थे तुम्हारे साथ
दिलाते हैं मुझे उस भूले हुए शहर की याद
कहाँ हो तुम...कहीं खो गए ..इस भीड़ में...
अब तो केवल कुछ  मीठी यादें ही हैं साथ

फिर भी एक उम्मीद जो जिन्दा है
 दिल के किसी कोने से आती है आवाज...
फिर मिलेगा तू मुझे निकल के अतीत की गलियों से
कहेगा" आओ ले चलूँ फिर तुम्हे अतीत की गलियों में "

इरा टाक...

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