Tuesday, 4 February 2014

कितना अच्छा लगता है कभी यूँ खुद से दूर जाना

कुछ न करते हुए बैठे रहना घंटो तक
सिर्फ शोर सुनते हुए लहरों का
भूल जाना अच्छी बुरी हर याद को
बहा देना नमकीन पानी में हर परेशानी
कितना अच्छा लगता है कभी यूँ
खुद से दूर जाना

रेत का घर बना के सीपियों से सजाना
नाम लिख कर अपना गीली रेत पर
खुद ही मिटाना
कितना अच्छा लगता है कभी यूँ
खुद से दूर जाना

हिचकोले खाती हुई मछुआरों की नाव
लोगो का समंदर में फूल नारियल चढ़ाना
रेत पर बैठे खोये हुए से प्रेमी जोड़े
खुद को भूल दुनिया पे नज़र
कितना अच्छा लगता है कभी यूँ
खुद से दूर जाना

कोई नहीं है साथ तो क्या
कायनात तो है
नए तराने बुन के
नए सुर में गुनगुनाना
कितना अच्छा लगता है कभी यूँ
खुद से दूर जाना ...इरा टाक ...~ET~

2 comments:

  1. दिल के दर्द को दिल तोडने वाला क्या जाने......
    प्यार के रिवाजो को ये जमाना क्या जाने ....
    बड़ी तकलीफ होती है कब्र में रह कर.......
    ये खुदा इस दर्द को फूल चढ़ाने वाला क्या जाने .....

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  2. सच कहा आपने कभी कभी खुद से दूर जाना अच्छा लगता है बहुत अच्छा लगता है । आज शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूं , अनुसरक बन रहा हूं ताकि आगे की पोस्टें सीधे डैशबोर्ड पर दिखें , बहुत बहुत शुभकामनाएं , लिखती रहें

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