Saturday, 3 January 2015

पहचान का संकट

पहचान का संकट आज जब भारत में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का दर्ज़ा मिला हुआ है, वास्तविक स्थिति बहुत भिन्न है
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधी आबादी की आज भी अपनी कोई अलग पहचान नहीं और ये स्थिति निम्न और माध्यम वर्ग में बहुत प्रबल है
आज भी वो अपने खानदान पिता, पति या लायक औलादों के नाम से पहचानी जाती हैं , न ही महिलाओं को ये भान है और न ही उन्हें होने दिया जाता है कि अपनी पहचान के साथ जीते हुए अपनी पहचान छोड़ जाना कितना सुखद होता है !
बचपन से ही उन्हें बंद माहौल  में पाला जाता है, गमले के पौधे को बाहर के जंगल से अलग रखा जाता है..ऐसे में उनका बाहर की दुनिया को समझ पाना मुश्किल हो जाता है , नतीजन वो अपनी अनंत शक्तियों और रचनात्मकता को घर परिवार तक सीमित कर लेती हैं
साथ ही साथ महिलाओं के खिलाफ मानसिक और शारीरिक हिंसा के मामलों में निरंतर बढ़ोतरी हुई है , छेड़छाड़ बलात्कार बढ़ते जा रहें हैं , मुख्य कारण है पुरुषवादी कुंठा ! वैसे कारण तो बहुत है , एक कारण में कई कई कारण छुपे हुए हैं !
आज भी स्त्रीयों में जो सबसे बड़ी कमी है वो है एकता की ,बहनापे की , अधिकांश स्त्रियां दूसरी स्त्री को आगे बढ़ते देख कर खुश नहीं होती बल्कि उसके चरित्र का पोस्टमार्टम कर डालने में विश्वास रखती हैं , उन्हें लगता है बिना गलत रास्ते के तो आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता , उसकी एक कामयाबी के पीछे वो १०० गलत कारण ढूंढेगी, अपने पिछड़ेपन को वो हमेशा दूसरेकी बुराई कर ढकने की कोशिश करती  हैं
स्त्री मोर्चा , स्त्री संगठन नाम से बहुत संस्थाएं  मिल जाएंगी पर वास्तव में आधी आबादी में कोई संगठन है ही नहीं ! अपनी ही जाति के लिए ईर्ष्या द्वेष भरा हुआ है , भेदभाव है ... अपनी पुत्री को हर सुविधा देने वाली सास अपनी बहु को बांध  के क्यों रखना चाहती है ? ये हर स्त्री को सोचना होगा मनन करना होगा .. अपनी ही जाति के प्रति भेदभाव क्यों प्रेमभाव क्यों नहीं ?
इरा टाक 

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