इरा टाक लेखक, फिल्मकार, चित्रकार हैं. वर्तमान में वो मुंबई में रह कर अपनी क्रिएटिव तलाश में लगी हुई हैं . ये ब्लॉग उनकी दुनिया की एक खिड़की भर है.
Thursday, 25 April 2019
Tuesday, 2 April 2019
कहानी : रेत के वादे
उस
शाम
लहरें
शांत
थीं,
गर्वीला
समंदर
भी
उदास
दिखता
था।
आरती टूटी हुई सी किनारे पर टहल रही थी। उसकी चप्पलें हाथ में थीं और वो पैर
के अंगूठे से गीली रेत को कुरेदती जाती, जैसे वक़्त बार बार उसके
ज़ख्म कुरेद रहा था।
गीली
रेत
पर
अकसर
वो
अपने
दर्द
लिख
आती
थी
इस
उम्मीद
में
कि
शायद
लहरें
उसके
दुखों
को
बहा
ले
जाए
.
कई
बार
सोचा
समंदर
की
तरफ
चलती
जाये
और
उसमें
खो
जाये
ताकि
उसे
वापस
उस
घर
में
न
लौटना
पड़े
जो
कभी
उसे
अपना
घर
लगा
ही
नहीं। पर हिम्मत नहीं होती मरने के लिए भी जीने से ज्यादा
हिम्मत चाहिए। वो समंदर में बने लाइट हाउस को देर तक ताकती रहती इस उम्मीद में कि शायद
वो उसको भी कोई रास्ता सुझा दे। घर में उसके पिता, बड़ा भाई और भाभी
थे। उसकी चार साल पहले शादी हुई थी पति के दवाब में उसने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। फिर
एक दिन उसके जुल्मों से परेशान हो वो घर छोड़ कर आ गयी। उसके मायके में किसी ने उसका
स्वागत नहीं किया पर उसके पास जाने को और कोई जगह नहीं थी। वो नौकरी के लिए आवेदन दे
रही थी। अभी तीस साल की थी और जीवन में अँधेरा होता दिखाई पड़ने लगा था। पिता को कोई
खास मतलब नहीं था जब भी मुंह खोलते कोई न कोई काम बताते। कभी उसके सिर पर हाथ फेर कर
उसका हाल नहीं पूछते।
भाभी तो सीधे मुंह बात ही नहीं करती थी। घर के सारे काम उसके
जिम्मे डाल दिए गए थे जैसे वो कोई बंधवा मजदूर हो। भाई का टूरिंग जॉब था वो पंद्रह
बीस दिन बाद घर लौटता तो भी उसे उसका हाल पूछने की फुर्सत न रहती। घर में एक कुत्ता
भी था जिसका नाम जैकी था, वो सुनहरे बालों और चमकीली आँखों वाला
था। जैकी पांच साल का हो चुका था। जब वो आया था तो केवल बीस दिन का था। रवि ने उसे
उसके जन्मदिन पर तोहफे में दिया था। घर पर उसने सबको बोला कि उसकी सहेली कृपा ने उसे
ये पिल्ला गिफ्ट किया है। रवि और आरती साथ ही पढ़ते थे। दोनों एक दूसरे के प्रेम में
थे पर घर वालों ने पता लगते ही उसका कॉलेज छुड़ा दिया और उसकी शादी करा दी। उसके बाद
आरती, रवि से कभी नहीं मिल सकी, कृपा ने
बताया था रवि ने आर्मी ज्वाइन कर ली और वो कश्मीर में कहीं पोस्टेड है. बस जैकी ही उसकी आखिरी याद था। जब बहुत दुखी हो जाती तो जैकी को गले से लगा
खूब रोती। और फिर जैकी पूंछ हिलाता हुआ उसको वापस घर चलने का इशारा करता.
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पेंटिंग - इरा टाक |
रोज़ शाम जैकी
को घुमाना उसकी ड्यूटी थी इस बहाने वो भी खुली हवा में साँस ले पाती थी। जब वो एक दिन
अपने पति के घर को छोड़ कर आ गयी थी तब सबसे खुश जैकी ही था। वो काफी कमज़ोर हो गया था
उसके शरीर पर कीड़े भी हो गए थे, क्योंकि कोई उसका ध्यान रखने
वाला नहीं था पर अब आरती के साथ वो फिर से तंदरुस्त हो गया था।
हर शाम वो सूरज ढलने के वक़्त जैकी को लेकर समुन्दर किनारे जाती। एक ऐसी ही
सिन्दूरी शाम में जब गीली रेत शरमा के लाल हो रही थी, वो उस रेत पर हाथ में एक नुकीली लकड़ी लिए कुछ लिख रही थी। जैकी समुन्दर की
लहरों में खेल रहा था और बीच बीच में नज़र घुमा कर उसकी तरफ भी देख लेता।
एक
खूबसूरत
लम्बा
लड़का
फुटबाल
खेलता
हुआ
वहां
से
गुज़रा
और
रेत
पर
उसकी
बनाई
आकृति
को
ठिठक
कर
देखने
लगा। उसकी नज़रें लड़के से टकराई, लड़का मुस्करा दिया। वो कुछ नहीं बोली और रेत झाड़ती हुई जैकी की तरफ चल दी।
लड़का उसे जाते हुए देखता रहा। काफी आगे जा कर एक बार उसने पलट कर देखा तो लड़का
उसकी कुरेदी हुई जगह पर ही बैठा था.
“इतनी देर क्यों हुई वापस आने में” –घर
में घुसते ही भाभी की कर्कश आवाज़ आई
“भाभी जैकी दूर चला गया था”-वो बोली
“अरे क्यों पाल रखा है इस बवाल कुत्ते को किसी काम का नहीं और
दो आदमियों का खाना खाता है”-भाभी रसोई में बर्तन पटकती हुई चिल्लाई
आरती चुपचाप कपडें सुखाने आंगन की तरफ बढ़ गयी।
***
आखिर
बहुत
मेहनत
के
बाद
आरती
ने
एक
एग्जाम
पास
कर
लिया
था, उसका अपॉइंटमेंट लैटर आया था । वो बहुत खुश थी। सुबह ऑफिस जाने
से पहले ही उसने घर का सारा काम निपटा दिया था। ये उसके जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत
थी. लोकल ट्रेन के लेडीज डिब्बे में बैठी वो नए सपने देख रही थी.
***
शाम को जब वो समुन्दर किनारे पहुंची तब सूरज डूब चुका था। ऑफिस में पहले दिन
का अनुभव कुछ ख़ास अच्छा नहीं रहा। सब उसकी पर्सनल लाइफ को जानने को उत्सुक थे। जैकी
की चैन थामे वो धीरे धीरे चल रही थी जैसे खुद को घसीट रही हो। जैकी लहरों की तरफ जाने
को मचलने लगा तो उसने हमेशा की तरह उसकी चैन खोल कर अपने हाथों में लपेट ली और उसे
खुला छोड़ दिया।
थोडा चलने के बाद वो थक गयी और वहीँ नर्म रेत पर पसर
गयी। नौकरी लग जाने का भी उसे कोई उत्साह नहीं था, कितने मन से वो
छगन लाल के यहाँ से देसी घी के लड्डू लायी थी पर भाभी ने ताना मार ही दिया था-
बीच पर केवल सन्डे को थोड़ी रौनक रहती थी बाकी समय सुनसान सा रहता था। दूर कुछ
बच्चे रेत से अपने सपनों का महल बना रहे थे और कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे.
दो लड़कियां चुस्त कपडे पहने रनिंग कर रहीं थीं और जैकी समुन्दर में गोते
लगा रहा था
एक आवाज़ ने आरती को चौंका दिया, वो उठ बैठी, वही कल वाला लड़का, आज हरे रंग टी शर्ट में था. मन तो किया कि चिल्ला दे,
वैसे ही भरी हुई बैठी थी. पर कुछ नहीं बोली,
लड़का देखने में अच्छे घर का लगता था
“रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा एक आएगी लहर कुछ बचेगा नहीं”
- लड़का थोड़ा मुस्कराया तो उसके गालों का डिंपल नज़र आया
उसको नज़रअंदाज कर वो उठ खड़ी हुई
और रेत झाड़ने लगी. जैकी जीभ निकाले भागता हुआ उसके पास आ गया, उसके सुनहरे बालों से नमकीन पानी टपक रहा था. जैकी पास
आते ही लड़के पर चढ़ने लगा. लड़का भी उसके साथ खेलने लगा
..
वो आगे बढ़ गयी. कुछ हल्का महसूस कर रही थी इतने समय बाद किसी ने उससे दो बात तो की,
वरना सिर्फ कडवी बातें या सवाल पूछती निगाहें!
बहुत मन कर रहा था एक बार मुड़ कर
देख ले पर फिर उसे दिल वाले दुल्हनिया का सीन याद आ गया जब शाहरुख़ खान “पलट- पलट” बोलता है और काजोल के
पलटने पर ये मान लेता है कि काजोल को भी उससे प्यार है. फिर भी
थोडा आगे जा कर उसने जैकी की चैन ठीक करने के बहाने से कनखियों से उस तरफ देखा जहाँ
वो उसे छोड़ आई थी. वो लड़का एक चट्टान पर कुछ लिख रहा था,
और उसकी पीठ थी.
अगले दिन ऑफिस से लौटते ही वो बीच
पर आ गयी, वो उस पत्थर पर लिखा पढ़ना चाहती थी पर अफ़सोस ! हाई टाइड होने की वजह से वो चट्टान पानी में डूब चुकी थी.
वो और जैकी देर तक बीच पर टहलते
रहे पर आज वो लड़का नज़र नहीं आया, मायूस हो वो वापस लौट गयी.
उसके बाद आरती तीन दिन बीच पर नहीं जा पायी क्यूंकि घर पर कुछ मेहमान
आये थे, बार बार उसे उस लड़के का ध्यान आता वो जानना चाहती थी
कि क्या लिखा होगा उसने पत्थर पर.
चौथे दिन जब पहुंची तो उस चट्टान
की तलाश करने लगी. एक दो ने तो पूछ भी लिया- “कुछ गिर गया
क्या?” बड़ी मुश्किल से वो चट्टान मिल पायी, उस पर लिखा
आरती के होठों पर बरबस मुस्कराहट
छलक आई. वो बीच पर टहलती रही, आज उसका मन खाली
नहीं था, उसकी आँखों में इंतज़ार था. पर
वो लड़का नहीं आया.
अँधेरा घिरने लगा था पर वो बैठी
रही, रेत पर अपनी उँगलियाँ फिराती रही, बार
बार उस लड़के की बात “रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा उसके कानों
में गूंजती… आज तो जैकी भी अपने आप लौट आया जैसे उसे घर वापस
चलने को बोल रहा हो. वो बेमन से उठी , कौन
था वो और पता नहीं क्यों नहीं आ रहा किससे पूछुं मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता.
रोज़ शाम आरती उस चट्टान के पास जवाब
देखने जाती पर कभी वो पानी में गायब रहती तो कभी कुछ नया लिखा नहीं मिलता, उनको दोबारा कुरेद आती ताकि मिट न जाए. जैसे ये लाइन्स
उसे ताकत देती हों! एक महीना निकल गया.
आरती को पहली तनख्वाह मिल चुकी थी
उसने फैसला कर लिया कि अब वो अलग घर लेकर रहेगी. वो दो ऑंखें जिसमें
उसके हर सवाल का जवाब था भले ही गुमशुदा हो गयीं हों पर उसको ख़ुद से प्यार करना सिखा
गयीं थीं. उसके अलग होने पर भी घर में बहुत मनमुटाव हुआ.
अकेले होने का मतलब ये तो नहीं वहां बोझ बन के रह जाओ जहाँ किसी को उसकी
खास परवाह नहीं. उसने एक कमरा किराये पर ले लिया, कमरे के कोने में ही एक छोटी सी रसोई पर ये जगह उसके और जैकी के लिए बहुत थी.
ये जगह बीच से दूर थी तो उसका समंदर किनारे जाना कम हो गया.
एक दिन रविवार को वो कुछ ज्यादा ही अकेलापन महसूस कर रही थी, होली करीब आ रही थी और उसका घर जाने का भी मन नहीं था ऐसे में वो घबराहट से
बचने को बीच की तरफ आ गयी. दोपहर में बीच सूना ही रहता था…
वो टहलते हुए उस चट्टान तक पहुँच गयी, और उसकी
ख़ुशी की कोई सीमा न रही जब उसने वहां लिखा देखा
वो जिसको भूल चुकी थी वो उम्मीद
फिर से खिल आई थी, उसके कदम तेजी से बढ़ गये. फिर अचानक
वो ठिठकी कहीं ये कोई मजाक हो ! पता नहीं किसने लिख दिया हो.
बीच के बाहर तो कई दुकानें थीं. आरती ने बीच से
बाहर आ कर वहां बनी चार पांच दुकानों के सामने दो तीन चक्कर लगाये पर हिम्मत नहीं
हुई - कैसे पूछे और क्या पूछे कि एक चट्टान पर लिखा देख चली आई.
आरती ने सकुचाते हुए बच्चे के हाथों
से वो पत्र ले लिया, थोडा दूर जाकर उसने बेचैनी से लिफाफा खोला और पढने लगी
“ आरती! तुमको
कई महीनो से देख रहा हूँ हर शाम, तुम जो भी लिखती थीं मैं चोरी
से पढ़ लेता था और चुरा भी लेता था...राइटर हूँ न ! अच्छी लगती हो एक आदत की तरह, हिम्मत भी की बात करने
की पर समझ गया तुम खुलना नहीं चाहती
अपने दोस्त से सब मालूम किया तुम्हारे
बारे में… सोचा फिर बात करूँगा पर लखनऊ में मेरे पापा का एक्सीडेंट हो गया, वहां रहा एक महीने, जब वापस आया पर तुम नज़र ही नहीं आई..
मैं तुमको और जैकी को बहुत मिस करता हूँ, तुम्हारा
लिखा देखा तो सोचा मिलूं पर तुमने शायद अपना घर छोड़ दिया, फिर
सोचा एक लैटर छोड़ दूँ क्यूंकि मुझे दोबारा लखनऊ जाना था”
आरती की आँखों में चमक आ गयी और
मोबाइल के कीपैड पर उसकी उँगलियाँ थिरकने लगीं, वो बहुत कुछ कहना
चाहती थी उसने भी तो कितने हज़ार कदम सुन्दर के इंतज़ार में चले थे. पर कुछ ज्यादा बोल न सकी. जल्दी मिलने के वादे के साथ
सुन्दर ने फ़ोन काट दिया. वो बार-बार मुस्करा
रही थी एक अलग तरीके से प्रेम ने उसके जीवन में दस्तक दी थी!
होली का दिन था और वो समंदर किनारे
सुन्दर के आने का इंतज़ार कर रही थी, जैकी हमेशा की तरह समंदर की लहरों
से खेल रहा था ! इस बार होली आरती के लिए नए रंग लाने वाली थी.
- इरा
टाक
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