Monday, 16 February 2015

एफ एस -32


  एफ एस -32
    
ये आपको किसी मिसाइल या कंप्यूटर प्रोग्राम का नाम लग रहा होगा ! कोई विज्ञानं की कहानी जो  रहस्य और भारी भरकम वैज्ञानिक शब्दों का से भरी होगी ! तो  मैं बता दूँ कि ये हमारी कहानी के सुपरहीरो का नाम है !
        बस "सुपरहीरो" सुनते ही आपने पूरी कहानी खुद ही गढ़ ली! FS -३२  दुनिया को बचाने आएगा,ढेरों दुनिया के दुश्मन और अकेला हमारा FS -32... !अरे रुकिए तो , ऐसा कुछ भी नहीं है जनाब ..! दुनिया को बचाने का तो पता नहीं ,पर हाँ FS -32  आपको हंसाएगा ज़रूर ... तो शुरू करें ..... 
     FS -
३२ हमारे पड़ोस में या यूँ कहें कि ठीक सामने रहने वाले मास्साब थे,.मास्साब नगरपालिका के इंटरकॉलेज में हिंदी पढ़ाते थे ,हिंदी का अध्यापक होने के नाते वैसे तो सभी रस उनमे कूट कूट के भरे हुए थे ,पर हास्य और व्यंग्य रस अति प्रबल थे। अपनी  लच्छेदार बातों से वो किसी को भी वश में कर लेते थे, हालांकि उनका तिलिस्म टूट भी  बहुत जल्दी जाता था। उनकी कोई भी बात आसानी से समझ नहीं आती थी ,कई बार तो मन में नोट कर ली जाती थी कि किसी बुद्धिजीवी से प्रसंग सहित व्याख्या करवाई जाएगी।
   लम्बा
कद ,हट्टाकट्टा कसरती शरीर ,चमकती ऑंखें ,बड़ी- बड़ी घुमावदार मूछें.. मास्साब का नाम श्री भीकूमल आचार्य था ,सब उन्हें उनकी पीठ पीछे भीकू अचार कहते थे , वैसे तो उनके कई उपनाम पड़े हुए थे ...नत्थू,कबाड़ी, रंगरसिया आदि आदि।
कस्बों और छोटे शहरों में उपनाम रखने की परंपरा बड़ी गहरी जमी हुई है, बाद में मुझे भी विश्वस्त सूत्रों से पता चला था कि मुझे "ताड़का" और "तिलदेवी" जैसे नामों से नवाजा  हुआ था ,खैर इस बात के लिए मैंने उस कॉलोनी के लोगो को ... लोगो क्या... शहर को भी कभी माफ़ नहीं किया !

      
मास्साब को FS -32 नाम एक्सक्लूसिवेली मेरा दिया हुआ था ,जिसके पीछे की सत्य घटना या कारण आपको थोड़ी देर बाद पता चलेगा।
फिलहाल थोड़ी जानकारी और वजह दूसरे नामों की दे देते हैं , "नत्थू" इसलिए कि उनकी काली घनी मूछें, शराबी फिल्म के नत्थूलाल जैसी थी। "कबाड़ी" इसलिए कि सड़क पर आते जाते कोई कील ,सुतली..बोतल आदि लावारिस हालत में मिल जाती ,तो तुरंत उसे अपनी पनाह में ले लेते थे। आस पड़ोस  में जब कोई कबाड़ी को रद्दी और फालतू सामान बेचता तो उसमें से आधा  सामान मास्साब के काम का निकल आता, सामने वाले को बड़ी कोफ़्त होती पर , अचार जी मेरा मतलब है आचार्य जी का रुआब था, तो मारे लिहाज़ के कोई कुछ कह नहीं पाता। इसलिए हम अपने घर की रद्दी अक्सर तब बेचना ठीक और सुरक्षित समझते थे , जब वो विद्यालय या किसी काम से बाहर गए हुए हों !
  "
रंगरसिया" नाम उनके छात्रों ने  दे रखा था ...! सूरदास की रचनाये पढ़ाते हुए वो ऐसे मग्न हो जाते कि लगता साक्षात राधा -कृष्ण कक्षा में प्रकट हो गए हों ! कभी कृष्ण जैसा नटखटपना चेहरे पर जाता, तो कभी राधा और गोपिओं की शर्मीली मुस्कान ...! मीरा बाई की रचनाये सुनाते तो ऐसा लगता  कि स्वयं मीरा ही सुना रही हों ,ऑंखें छलक आती ,आँखों की चमक लालिमा से ढक जाती !सभी छात्र बड़ा मन लगा के उन्हें देखते सुनते थे और मुँह दबा के हँसने से कईओं को सांस की बीमारी तक हों गयी थी (इसे आप अतिश्योक्ति की श्रेणी में ले सकते हैं )
   
मास्साब बला के कंजूस थे ,परिणाम स्वरुप  उन्होंने अथाह सम्पत्ति जमा कर ली थी।.घर में उनका कठोर अनुशासन चलता था , उनकी परम प्रिया पत्नी जिनका उपनाम "सीसी" उर्फ़ छोटा चेतन था , उनके लिए रडार का काम करती थी, विधायलय और अन्य मास्टरों की हर गतिविधि, पर तो मास्साब की  पैनी नज़र रहती ही थी, बाकी उनके घरों की खबरे उन्हें सीसी मास्टरनी से मिल जाती थीं सूचना और प्रसारण तंत्र उन्होंने अति विकसित कर रखा था  उनके चार लड़के थे और सभी इस फ़न में माहिर थे ,.सबके पास एक एक साईकिल थी ,वो पेट्रोल की बढ़ती कीमतों की चिंता से अपने परिवार को दूर रखना चाहते थे.. !सबके काम बँटे हुए थे ,मज़ाल जो इधर की उधर हों जाये , कभी कोई झगड़ा टंटा होने पर वो सब लठैत भी बन जाते थे,वैसे  तो वो जात से ठाकुर थे पर  सब के सिर पर शिखा थी,जिस वजह से वो  "चोटी ब्रदर्स" के नाम से जाने जाते थे।
                         इम्तिहान आने से दो  महीने पहले उनके घर पर स्टूडेंट्स की आवाजाही अचानक बढ़ जाती थी , सुनने में आया था कि उन्होंने साफ़ शब्दों में कह रखा था "अगर मेरे विषय में पास होना है तो कम से कम दो महीने मेरे पास ट्यूशन पढ़ने आना होगा ! "
अब जिसके हाथ में सत्ता हो उसकी तो माननी ही पड़ती है !
  
हर एकादशी को हमारा ब्लॉक, मन्त्रों के उच्चारण और धुंए से भर जाता, कई बार मैं भी उनके हवन में शामिल हों जाया करती थी ।उनके कोई लड़की नहीं थी तो अपना पुत्री स्नेह वो मुझ पर उड़ेल देते  !.मेरी माता जी को वो बिलकुल नहीं सुहाते थे , वैसे भी दोनों के एक ही पेशे (मेरी माता जी भी दूसरे कॉलेज में शिक्षिका थी) में होने से पारम्परिक विद्वेष स्वाभाविक था ,थोड़ी इस बात से प्रेमभाव बचा था कि दोनों के विषय अलग थे !
   
मास्साब के घर में ढेरों वेद पुराण भरे हुए थे ,जब वो जोर जोर से मंत्र पढ़ते तो मैं मन ही मन उनकी भक्त हों जाती और अपने नास्तिक इंजीनियर पिता को उनसे रिप्लेस करने की कामना करने लगती ।आधुनिक युग में सतयुग का लाइव टेलीकास्ट करता प्रतीत होता था उनका परिवार ...!
बाद में एक दिन हवन में शामिल होने के दौरान मुझे एक बात मालूम पड़ी कि वो एक कटोरी डालडा में एक चम्मच देसी घी मिलाते थे..कंजूसी करने में वो भगवान को भी नहीं छोड़ते थे ,पर फिर भी मैं उन्हें पसंद करती थी                             
       
उनके घर में त्योहारों की बड़ी धूम रहा करती थी ... जन्माष्टमी पर झांकी सजाना.. पूरे दिन बैठ के लड्डू और मठरी बनाना ., होली पर सुबह से रात तक पूरा परिवार गुजिया बनाने में जुटा रहता था ... उनकी चुहिया जैसी गुजिया में मावा कम और सूजी ज़्यादा होती थी ... बड़े मनुहार करके वो एक को दो से तीन  गुजिया ज़रूर खिलाते थे!और उस गुजिआ की जब तक तीन -चार बार तारीफ नहीं सुन लेते सामने बैठे मेहमान को हिलने नहीं देते!    
     
रविवार को मास्साब का  पूरा परिवार "महाभारत" देखने हमारे यहाँ धमक जाता ,क्यूंकि उनका पुराना ब्लैक एंड वाइट क्राउन  टीवी अक्सर रविवार को हड़ताल कर देता था ।अब ये हड़ताल पूर्वनियोजित होती थी या आकस्मिक, इसके बारे में हमारा संदेह अब तक बना हुआ है !
      
सीरियल के दौरान आने वाले भावुक दृश्यों से मास्साब के आंसू और नाक निकल आती ,जिसे वो हमारे बाथरूम में पूरे अधिकार और गर्जना के साथ छिनक के आते थे ।मेरी माता जी लिहाज़ में कुछ बोल नहीं पाती थी पर उनके मन में छिड़ी महाभारत टीवी पर चल रही महाभारत से काम विध्वंसकारी नहीं होती थी। उसके बाद पूरे दिन माता जी का मूड ऑफ रहता था ... !
एक दिन रविवार को बिजली नहीं रही थी तो मास्साब बैटरी से टीवी चलाने पर अड़ गए,ये नब्बे  के दशक की बात है जब इन्वर्टर का प्रचलन आम नहीं था,पर थोड़ी बहुत रौशनी के लिए पिता जी ने बैटरी लगा ली थी जिससे कुछ छोटे बल्ब जलाकर  गुज़ारा चल जाता था, और लैंप - पेट्रोमैक्स की गर्मी से राहत मिल जाती थीमहाभारत को वो किसी भी कीमत पर मिस नहीं करना चाहते थे पर मेरी मम्मी ने कठोर रुख अपनाते हुए साफ़ मना कर दिया ! महाभारत देख पाने के फलस्वरूप जो शीत युद्ध प्रारंभ हुआ वो कई सालों तक चला !
  
शीत युद्ध के दौरान दोनों पक्षों में लेन देन, बोल चाल कम हों गयी ,देख के अनदेखा करने की प्रथा आरम्भ हों गयी ! मेरी बातचीत लगातार चालू थी, तो कई बार मास्साब अपने व्यंग बाण, मेरे द्वारा माता जी तक पहुँचा देते थे !फिर मेरी माता जी ने भी उनके सबसे छोटे पुत्र गणेश, जो मेरा बालसखा था ,को जवाबी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया !जिससे  निरन्तर आग में घी पड़ता रहता ...
     
फिर मेरे घर में फ़ोन लगा ,मुझे आज तक याद है कि वो विश्व दूरसंचार दिवस था ,सत्रह मई ,वैसे तो मुझे सुबह का शाम याद नहीं रहता पर कुछ चीज़ें भूल से याद रह जाती हैं ..! फ़ोन की घंटी घनघनाहट ने उधर से शांति वार्ता की पहल कराई... कारण... दूर से उनके रिश्तेदारो के फ़ोन आना...! अब उन्हें नुकक्ड़ की दुकान पर फ़ोन सुनने नहीं जाना होगा या फिर मिश्रा जी की बीवी की जलती हुई निगाहों और तानों का सामना नहीं करना पड़ेगा। मिश्रा जी के घर कॉलोनी का एकलौता और पहला फ़ोन था, जिसकी वजह से उनकी कॉलोनी में धाक थी, लेकिन बाद में यही उनके सरदर्द का मुख्य कारण बन गया, पर मिश्राइन मुँह फट थी साफ़ कह देती ....
  "कोई समाज सेवा को लगाओ है जे फ़ोन .. इत्ती बात करन का शौक हेगा  तो खुदई अपने घर में काहे नहीं लगा लेते ! "
     खैर थोड़ा बहुत सहयोग तो आस पड़ोस में चलता है, ये सोच के माताजी ने  शांति प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। पर बीच बीच में विरोध की छुटपुट घटनाएँ होती रहीं ,अविश्वास बना रहा ..!उनके फ़ोन हमसे ज़्यादा आते ,जैसे ही फ़ोन की घंटी बजती, मैं लपक के उठाने जाती  दूसरी तरफ से आवाज आती....
"ज़रा सामने से बुला देंगे "
और मेरा मुँह लटक जाता ... !
एक दिन मुझे बड़ी शिद्दत से अपने नए नए बने बॉयफ्रेंड के फ़ोन का इंतज़ार था , बड़ी बेसब्री से फ़ोन के आगे पीछे चक्कर काट रही थी, कि अचानक घंटी बजी ,मैंने धड़कते दिल से रिसीवर उठाया और कांपती हुई  आवाज़ में बनावटी अंग्रेजी मिठास का तड़का लगा के बोला " हेलो "
"
ज़रा सामने से बुला देंगे "
और मेरे मुँह से बड़े ज़ोर से  निकला ....
"
ओह्ह शिट्ट्ट्ट्ट  .... ! "
"ओह्ह शिट" शब्द  मैंने हाल में  ही अपने शब्द कोष में शामिल किया था !
 
फिर जब भी उनके लिए  फ़ोन आता तो हम कहते  "ओह्ह शिट का फ़ोन " गया।

बहरहाल
हम मुद्दे पर वापस आते हैं , FS - ३२ नामकरण का मुद्दा  !

       हुआ यूँ कि शिवरात्रि का दिन था, मास्साब का पूरा परिवार शिवमंदिर दर्शन को गया था।मास्साब वहीँ से ट्यूशन पढ़ाने चले गए ,घर लौटे तो देखा घरवाले अभी वापस नहीं आये थे ,दरवाजे पर ताला लटका हुआ था। बड़े सलीके से उन्होंने हमारा दरवाज़ा बजाया, खटखटाने की बजाय "बजाना" कहना इसलिए ठीक होगा , क्यंकि वो हमेशा कुछ तबले की तरह दरवाज़े पर थाप देते "तक धिन.. धिन तक " !
     
ये मास्साब का "सिग्नेचर खटखटाना" था। शिवरात्रि का व्रत होने की वजह से मैं और मेरी माता जी  ढेरों फलहार जैसे तले भुने मखाने,समा की खिचड़ी ,कुटु के आटे की पकौड़ी  बना के अपना पेट भरने में जुटे थे ! मेरी मम्मी को व्रत में कमज़ोरी आने का बहुत डर लगता था। खाने की प्रकिया में आये "मास्साब विघ्न" से उनके माथे पर बल पड़ गए ! मेरे पापा दूसरे शहर में नौकरी करते थे , ज़्यादातर समय मैं और मेरी माँ ही साथ रहते थे,इसलिए ,उनको ले दे कर मैं ही मिलती थी जिस पर वो अपना प्यार,गुस्सा आदेश सब लागू  करती थी !
मुझे दरवाज़ा खोलने का आदेश देती हुई , स्वयं वो कुटु की पकौड़ियों से भरी प्लेट लेके कमरे में चली गयी और उनके साथ मेरा मन भी , जो उन पकौड़ियों पर अटका था !
मास्साब  मुस्कराते हुए अंदर आये उनके हाथ में कुछ सामान था , सामने भुने हुए मखाने देख के वो तुरंत कुर्सी पर पसर गए

 "
अंकल लीजिये "
मेरे आग्रह करने पर उन्होंने आठ दस मखाने  ले लिए,वैसे आग्रह भी करती तो भी वो ले ही लेते,औचारिकताओं में कम विश्वास करते थे, खासकर खाने पीने के मामले में !
"
ये लड़के लोग अभी तक लौटे नहीं ,मुझे काम से जाना है ,ये कुछ सामान छोड़े जाता हूँ ,तुम दे देना "
उसके बाद उन्होंने थैले से सारा सामान सामने पड़ी मेज पर उलट दिया और दोबारा थैले में सलीके से भरने लगे।इस बीच मम्मी बाहर आई और उनसे पत्राचार सम्बन्धी कोई जानकारी लेने लगीं पर मास्साब सिर्फ  हाँ हूँ में जवाब देते रहे,उनका सारा ध्यान  थैले पर था ! थैला जमा कर और चाय पी कर उन्होंने प्रस्थान किया !
    
लगभग एक घंटे बाद जब मैं खेलने को अपने घर से बाहर निकली , तो उनके दरवाज़े पर चौक से लिखा सन्देश दिखा।हम लोग अक्सर अपने घरों के दरवाजों पर सन्देश  लिख कर छोड़ जाते, जैसे "चाबी सामने से ले लेना "," खाना खा लेना ,आने में देर होगी.."आदि आदि उस समय मोबाइल का ज़माना तो था नहीं कि बात  बात पर एस एम एस   या कॉल कर देँ। गुप्त सन्देश अंदर कमरे में कागज पर लिख के छोड़े जाते थे।
   
मैं दो सीढ़ियां उतर चुकी थी ,पर अपनी आदत के मुताबिक मैंने सन्देश पढ़ने को वापस दो सीढ़ियां चढ़ीं,.वो सन्देश जिसे  मास्साब अपनी मोती जैसी लेखनी से पिरो गए थे !
   
वैसे मेरी बुद्धिमता का लोहा बात बात पर नुक्स निकालने वाले मेरे पिता जी भी मानते थे,.पर सन्देश को समझने में मुझे भी कुछ वक़्त लगा ।संदेश समझ आने पर मुझे धक्का लगा  ....  ज़ोर से हसीं भी आई और कुछ कहने सुनने को शब्द सूझे ,निरंतर तीव्र गति से बढ़ता जा रहा, मेरा शब्दकोष ख़ाली सा नज़र आया ...
सन्देश कुछ ऐसे था
"
प्रिय गणेश
सामने से सामान ले लेना ..मैं काम से जा रहा हूँ
फल संख्या 32 "


       मैंने दोबारा अपने घर का दरवाज़ा खटखटाया और मास्साब  का थैला एक बार फिर से मेज पर ख़ाली किया, छोटे छोटे बारह केले और बीस अमरुद थे, कुल जमा ३२ ही थे ...जी हाँ ... ! फलों की संख्या बत्तीस ही थी!

मास्साब  का हमारे ऊपर घोर अविश्वास देख कर हमारे परिवार को पता नहीं कैसी विचित्र फीलिंग हुई..!. आप जानते हों तो बताना इस फीलिंग का नाम ..क्यूंकि उस के  लिए फिलहाल मुझे कोई शब्द नहीं मिल पा रहा !
गणेश के आते ही मैंने उसे गिन कर बत्तीस  फल सौपे ... और बोला भी ठीक से चेक कर ले "फल संख्या 32"
वो बहुत शर्मिंदा हुआ,उसने वो सन्देश मिटा दिया ,पर जो दिमाग पर छप जाये वो कभी मिटता है भला ?
 
कई दिनों तक ये फल संख्या वाला मुद्दा चर्चा में बना रहा !
और मास्साब का नाम "फल संख्या 32 " रख दिया गया ! इसे आधुनिक रूप देने के लिए बाद में FS -32 कर दिया गया !
तो ये थी एक उपनाम की सच्ची कहानी...गोपनीयता बनाये रखने को स्थान और पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं ..सिर्फ फलों की संख्या वास्तविक है!   

6 comments:

  1. nice Aap Kya likhte hai pta hi Nhi kb story over ho gai.

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  2. शुक्रिया आपका

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  3. बहुत सुन्दर ... रोचक शैली - वंदना बाजपेयी

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    1. शुक्रिया वंदना जी

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